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ब्लॉग — 40

विषय — समाधि [ अष्टांग योग : आठवां अंग ]

आप सभी का हमारे ब्लॉग ‘ ज्ञात से परे ’ में हार्दिक स्वागत है, हमने अपने पिछले ब्लॉग में जाना अष्टांग योग के सातवे अंग ध्यान के बारे में, इसी कड़ी में हम आज के ब्लॉग में जानेगें अष्टांग योग के आठवें अंग समाधि के बारे में,

समाधि — अष्ठांग योग के रचयिता महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के आठवें अंग यानि समाधि के अर्थ और स्वरूप का वर्णन एक सूत्र के द्वारा किया है जो कि निम्न है,

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि:। [ 3 / 3 यो0सू0 ]

अर्थात् जब (ध्यान में) केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीती होती है और चित्त का निज स्वरूप शून्य सा हो जाता है, तब वह (ध्यान ही) समाधि हो जाती है, पातंजल योगसूत्र में चित्त की वृत्तियों के निरोध को योग कहा गया है,

योगश्वित वृत्ति निरोध

अर्थात महर्षि पतंजलि के अनुसार समाधि अवस्था में भी योगी की समस्त प्रकार की चित्तवृत्तियों का निरोध हो जाता है यानि कि धारणा और ध्यान एक हो जातें हैं, एवं इससे संयम की स्थापना होती है।

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